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महंगाई की समस्या पर निबन्ध | Hindi Essay on The problem of Inflation in India!

प्रस्तावना:

भारत की बहुत सी आर्थिक समस्याओं में महंगाई की समस्या एक मुख्य है । वर्तमान समय में महंगाई की समस्या अत्यन्त विकराल रूप धारण कर चुकी है । एक दर से बढ़ने वाली महंगाई तो आम जनता किसी न किसी तरह से सह लेती है, लेकिन कुछ समय से खाद्यान्नों और कई उपभोक्ता वस्तुओं के मूल्यों में भारी वृद्धि ने उप कर दिया है ।

वस्तुओं के मूल्यों में वृद्धि का क्रम इतना तीव्र है कि आप जब किर को दोबारा खरीदने जाते हैं, तो वस्तु का मूल्य पहले से अधिक हो चुका होता है । गरीब और गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों के मुख्य खाद्य पदार्थ गेहूँ के लगभग एक-तिहाई बढ़ोतरी इस समस्या के विकराल होने का संकेत दे रही है ।

चिन्तनात्मक विकास:

कीमतों में निरन्तर वृद्धि एक दहशतकारी मोड़ ले रही है । कारण मनुष्य की समाज में उन्नत जीवन जीने की इच्छा एक दिवास्वप्न हो गई है । पदार्थो की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि हुई है, इसका कारण है हमारी कृषि व्यवस्था र्क अवस्था ।

कालाधन, जमाखोरी, राजनीति में व्याप्त भ्रष्टाचार, गरीबी, जनसंख्य अल्पविकास, राष्ट्रीयकृत उद्योगों में घाटा, सरकारी कुव्यवस्था, रुपये का अवमूल्यन, मुद्रास्फीति इत्यादि ऐसे कारक हें जो निरन्तर महंगाई को बढ़ाये जा रहे हैं । महंगाई आज राष्ट्रीय ही नहीं अपितु अन्तर्राष्ट्रीय समस्या बन गई है । महंगाई के कारण असन्तोष बढ़ रहा है हर वर्ग के लोग त्रस्त हैं । बढ़ती महंगाई अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र को प्रभावित कर प्रत्येक वस्तु के मूल्य एवं किराये बढ़ रहे हैं ।

प्रत्येक उपभोक्ता वस्तुओं की पूर्ति में रही है । जहाँ तक खाद्यान्नों का प्रश्न है उसकी वृद्धि दर तो और भी कम है यानि तव प्रतिशत प्रतिवर्ष लगभग जनसंख्या वृद्धि दर के समतुल्य । इसलिए इसका कारण अन की जरूरत नहीं है कि देश में खाद्यानने संकट क्यों है और मूल्य बढ़ क्यों रहे है । यह है कि भारत में चूंकि कृषि ही आजीविका का मुख्य आधार है इसलिये यह सारे प्रभावित करती है ।

सरकार ने कृषि की घोर उपेक्षा की है, काले धन को रोकने के नहीं किया गया है तथा विदेशी धन की बाढ़ के कारण बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का भी इंतजाम नहीं किया गया है । यही कारण है कि वह मुद्रास्फीति को रोक नहीं प जिससे भारत में यह साल दर साल ऊपर जा रही है ।

जब तक सरकार वर्तमान् पर कायम रहेगी, मुद्रस्फीति बढ़ेगी और आम आदमी का जीवन दूभर होता रहेगा । वृद्धि का सरकार के पास कोई जवाब नहीं है । सरकारी नीतियों की विफलता ने य’ में वृद्धि की है । जब तक इन सभी विसंगतिर्यो को दूर नहीं किया जा सकता तब तक महंगाई कम नहीं हो सकती ।

उपसंहार:

कीमतों में वृद्धि के कारणों को दूर करने के साथ-साथ आवश्यकता संकल्प की और उसके लिए राष्ट्रीय संस्कार तथा संचेतना की । राष्ट्र के कर्णधार यदी अपने व्यक्तिगत और दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर विचार करें, तो देश अपने सभी विद्द्यामान तथा उपलब्ध साधनों के आधार पर राष्ट्र की प्रगति तथा सुख समृद्धि के मार्ग में आने वार और कठिनाइयों को दूर कर सफलता अर्जित कर सकता है ।

भारत में महंगाई की समस्या अत्यन्त विकट रूप धारण करती जा रहा ह । पहले तो महंगाई का मूल कारण जनसंख्या वृद्धि को ही माना जाता था किन्तु आज अनेक कारण ऐसे गए हे जो इस समस्या को और भी जटिल बनाते जा रहे हैं । कुछ धनी वर्गो को छोड़ का प्रत्येक वर्ग इससे प्रभावित है ।

विगत कुछ वर्षो से मुद्रस्फीति ने आम आदमी की कमर तोड़ दो है । बावजूद इसके लगातार यह घोषणा करती रही है कि वह मूल्य को नियन्त्रित करने में सफल रही है । आज की हालत यह हे कि आम आदमी महंगाई की आग में बुरी तरह झुलसता सत्रास की हालत रहा है, यइ कोई रहस्य नहीं है ।

बेशक, गोह की किल्लत एवं अचानक उसकी उछलती के कारण ही देश का ध्यान महंगाई के संकट पर केन्द्रित हुआ हे । किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि दामों की बढोतरी का सकट यहीं तक सिमटा है । दैनिक उपभोग की शायद ही चीज हो जिसकी कीमत को न्यायसंगत माना जाए ।

सच्ची बात यह है कि बढती कीमते जिंदगी में इस कदर शुमार हो चुकी हैं कि इसकी दैनंदिन चुभनों पर हम आह नहीं भ जाते हैं क्योंकि हमे महंगाई की मार से बचने का कोई ठोस रास्ता कहीं भी नजर नइ लेकिन कम से कम अब वह फिल्मी गाना वयंग्योक्ति भरा नहीं लगता जिसमें कहा गया है की “पहले मुट्‌ठी भर पैसे से झोली भर शक्कर लाते थे, अब झोले भर पैसे जाते हैं, मुट्ठीभर शक्कर लाते हैं ।”

किसी बुजुर्ग से बात करिए । इस बात की पुष्टि हो जाएगी कि तीन-दशक पूर्व महज दस से पद्रह रुपए में सब्जी सहित दैनिक उपयोग की इतनी चीजें मिल जाती थीं कि एक आदमी के लिए ढोना मुश्किल हो जाता था और आज इतने चीजें आप हाथ में लिए चले जाए ।

तो यह है महंगाई का आलम । यहाँ यदि हम विस्तार से न भी जाएं तो भी हमें पता चल जायेगा कि किस चीज की कीमत पिछले तीस-चालीस सालो में कितने गुना बढी है । जो आँकड़े हैं, वे स्वयं अपनी कहानी कहते हैं पाठक जोड-घटाव करके हिसाब लगाए तो चकराने ब सामने आएंगे ।

उपभोक्ता मूल्य सूचकांकों की तो बातें छोड़ दीजिए क्योंकि विश्व अथ इसे मानक की इज्जत नहीं मिली हुई हे । थोक मूल्य सूचकांकों को भी आधार बनाएँ तो सन 1961-62 के साढे तीन दशको में कई उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें तीन हजार से हजार प्रतिशत तक बढ गई हैं । कुछ क्षेत्रों में इससे भी कई गुना ज्यादा दाम बड़े हैं ।

उदाहरणस्वरुप, सन् 1961 में टमाटर की कीमत 10-15 पैसे किलो थी । आज यह 12 से 15 रूपय किलो है । यानी टमाटर को कीमत मे सौ गुना की बढोतरी हो गई । इसी तरह तब दूध एक रूपय में ढाई से तीन लीटर मिल जाता था, आज यह 12 से 15 रुपए लीटर है ।

अरहर की दाल तब 80 पैसे में 1 रुपये किलो उपलब्ध थी । आज यह 30 से 35 रुपए किलो मिल रही है अर्थात 30-35 गुना की वृद्धि । बस किराये को ही लीजिए । महज दो दशक पूर्व न्यूनतम वि तथा अधिकतम 35 पैसे था ।

आज न्यूनतम एक रुपये तथा अधिकतम पांच रुपये हो गया है । इस प्रकार की फेहरिस्त गिनाने लगे तो कितनी लंबी हो जाएगी, इसका अंदाजा लगान है । वास्तव मे सरकारे आती-जाती रही, महंगाई की सुरक्षा अपनी इच्छानुसार मुंह फैलाती रही ।

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के निष्कर्ष के अनुसार महंगाई अपने सामान्य चाल में प्रतिशत प्रतिवर्ष के हिसाब से बढ रही है । यानी यदि चीजें सामान्य ढग से बाजा रहीं तथा कीमतो पर अकुश रखा जाए तब भी दस प्रतिशत की सामान्य वृद्धि को नहीं रोका जा सकता ।

स्पष्ट है कि हालात यदि थोड़े भी असामान्य हो जाए तो फिर कीमतें इससे कई ज्यादा उछलने लगेगी । जाहिर है कि इस दुःखदायी हालात के लिए सामान्यत: किसी एक सरकार को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता । हमने विकास का जो ढाचा खड़ा किया एवं अर्थव्यवर के जो ताने-बाने बुने-मूलत: उसी में इस रोग की जड़ निहित है ।

महंगाई के कई पहलू हैं । महंगाई गरीब आदमी के लिए अलग होती है और मध्य वर्ग लिए अलग । अमीर वर्ग के लिए तो बिल्कुल ही भिन्न होती है । अगर महगाई बढी है तो यह देखना होगा कि किन चीजो के दाम बढे हैं । स्पष्ट है कि 1991 के बाद गरीब आदमी पर बोझ बढ़ा है ।

उसकी आवश्यकता की सारी चीजों के दाम बढे हैं । इसे देखते हुए लगता है कि सरब को गरीबों की तनिक भी चिता नहीं है । सरकार की आर्थिक नीतियां ही ऐसी है कि इससे आ और ज्यादा अमीर तथा गरीब और ज्यादा गरीब होता जाएगा ।

अगर महंगाई और आमदनी सा अनुपात में बड़े, तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा । लेकिन यहाँ तो आम जनता की आमदनी कम रही है और वस्तुओ के मूल्यों मे वृद्धि दर जारी है । दरअसल यह मुद्रास्फीति की स्थिति है । आमदनी बढेगी और उत्पादन बढेगा तभी मुद्रास्फीति भी नियत्रित रहेगी ।

आज महगाई का सबसे बडा कारण है कालाधन । कालेधन की गिरफ्त में देश के बडे नेत से लेकर उद्योगपति और अधिकारी तक शामिल हैं । कालेधन का सबसे बुरा असर मुद्रास्प और रोजगार के अवसरो पर पड़ता है ।

यह उत्पादन और रोजगार की संभावना को कम देता है और दाम बढा देता है । इस तरह से देश की सबसे बडी समस्या है कालेधन की समर इसका प्रभाव सिर्फ आर्थिक ही नहीं, सामाजिक, राजनीतिक और सास्कृतिक क्षेत्रों में भी है । जनता कालेधन के परिणाम के बारे में पर्याप्त नहीं जानती है ।

उसमे अभी पर्याप्त चेतना जगी है । आज कालाधन 80 करोड रुपये ही है । अनुमानत: देश मे कालेधन की मात्रा साढे लाख से पांच लाख करोड़ रुपये के बीच होगी । जब हमारे नीति-निर्माता ही गलतियां करने तो आम जनता को सही जानकारी कैसे मिलेगी ? देश की मौजूदा आर्थिक बदहाली का बडा कारण सही आर्थिक नीति का न होना है ।

हां, पूर्व सरकार द्वारा अर्थव्यवस्था को उदारवादी छौंक मिलने के बाद बाजार कुछ ज्यादा अनियंत्रित हुआ है । तभी तो कुछ अर्थशास्त्री यह सवाल उठा रहे हैं कि पूर्व सरकार के शासन में जब कीमतें बढी तो कहीं से ऐसा हाहाकार नहीं मचा जैसा आज मचा हुआ है । यह सवाल एकदम नावाजिब भी नहीं है । पूर्व सरकार ने बाजार तक आम आदमी की पहुच सुनिश्चित रहने की उपयुक्त व्यवस्था किए बगैर ही अर्थव्यवस्था को उनुक्त करना शुरू कर दिया ।

परिणामत: बाजार बेलगाम होता रहा एवं सामान्य आमदनी वाले की जिंदगी दूभर होती गई । लेकिन यह अर्थ नहीं कि वर्तमान सरकार पर मौजूदा संकट की कोई जिम्मेवारी ही नहीं है । अपनी तमाम नीतिगत कमजोरियो के बावजूद पूर्व सरकार की एक निश्चित दिशा थी, राजनीतिक क्य के प्रति एक निश्चिंतता का भाव था एवं सरकार में सामूहिक जिम्मेवारी का माहौल था, सो कभी इतनी नहीं बिगडी ।

कीमतों के स्तर पर कभी अचानक विस्फोट या बाजार में एकाएक जैसी स्थिति पैदा नहीं हुई । सरकार में शामिल घटकों के बीच यदि आपसी समझ होती, नीतियों के प्रति मतैक्य होता, सामूहिक उत्तरदायित्व के भाग के साथ-साथ अगर नेतृत्व प्रभावी हो हालात इस सीमा तक नहीं बिगड़ते ।

गेहूँ की कीमत को ही आधार बनाएं तो सामान्य के दायरे में आने वाली कोई भी सरकार आतरिक पैदावार एवं भंडार का जायजा लिए बगैर निर्यात नीति की घोषणा नहीं करती । एक रीढविहीन सरकार के लिए चारों तरफ के झेल पाना आसान नहीं । इसलिए गेहू या फिर चीनी निर्यात का फैसला किया गया ।

इस् किसान लॉबी को तो लाभ हो गया, निर्यात का ग्राफ भी ऊपर चढ गया, पर बाजार गया । यह संकट सरकारी कुव्यवस्था का ही परिणाम है । पर इस यथार्थ का महत्व तत्व के सदर्न तक ही सीमित है । वस्तुत: कीमते बढ़ने के कारण इतने गहरे हैं कि इन्हें कर पाना आसान नहीं ।

वास्तव में बाजार हमारी समूची अर्थव्यवस्था का ही दर्पण है । अर्थव्यवस्था के सम उपांग एक-दूसरे से इतने अंतर्सम्बद्ध हैं कि किसी एक के रोष का प्रभाव सभी पर एक सतुलित अर्थव्यवस्था की पहचान है, स्थिर मूल्य, नियंत्रित मुद्रास्फीति एवं तीव्र विकास ।

इस कसौटी पर कसे तो हमारी पूरी अर्थव्यवस्था असतुलित व दोषपूर्ण नजर आएगी । ऐसे तो अस्थिर रहेगी ही । शुक्लात अनाज की कीमत से ही करें । कीमतें बढी क्यों ? मांग के अनुताप में जब उपलब्धता कम होती है तो कीमते बढती हैं ।

उपलब्धता पूरी तरह उत्पादन है । जमाखोरी से भी बाजार में कृत्रिम अभाव पैदा होता है, किंतु जमाखोरी भी किल्लत या संभावना के मद्‌देनजर ही की जाती है । भारत के सदर्भ में सच्चाई यह है कि जिस त् वार्षिक दर के हिसाब ले हमारी आबादी बढ रही है-उसके अनुपात में पैदावार नहई अब पैदावार क्यो नहीं बढ रही ?

तो इसके लिए जो मूलभूत जरूरी चीजें चाहिएं-वे पर्याप्त में उपलब्ध नहीं हैं । यानि सिचाई सुविधा का पर्याप्त विस्तार नहीं, उन्नत किस्म के बीज आदि का अभाव है । किसानो के पास उन्नत कृषि तकनीक सहित अन्य आवश्यक संसाधन तक उपलब्ध नहीं ।

सरकारी नीतियो की दृष्टि से भी देखे तो हमारी अर्थव्यवस्था की मे के बावजूद कृषि पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा । सन् 1979-80 में कृषि के घरेलू उत्पाद की 19 प्रतिशत राशि आवंटित थी । सन् 1994-95 में यह 10 प्रतिशत से भी नीचे आ गया ।

सन 1995-96 में थोडी कृषि निवेश की राशि 10.8 प्रतिशत कर दी गई । ध्यान रखने की बात है कि निवेश में कमी सन 1991 में नई अर्थनीति अपनाने के बाद से लगातार आयी । उर्वरको की हालत विगत समय पूर्व यूरिया 101.5 लाख टन के लक्ष्य की जगह मात्र 18.8 लाख टन । हुआ है । ऐसे मे पैदावार बढे तो कैसे ? उस पर दुर्भाग्य यह कि जो पैदावार होती है उन् की उचित व पर्याप्त व्यवस्था नहीं । हमारी कुल भंडारण क्षमता 2 करोड 62 लाख जिसमे भाड़े पर लिए निजी गोदाम भी शामिल हैं ।

इसके कम से कम पाच गुना, तत्काल, जरूरत है । लोकन हमारे पास न कोई योजना है, न संसाधन । भडारण हर वर्ष करोडो की पैदावार बरबाद हो जाती है । हर वर्ष 300 से 400 करोड रुपर सब्जियां कटने के बाद बरबाद हो जाती हैं । ऐसी हालत में सामानों की किल्लत एवं कीमतों चढाव एकदम स्वाभाविक है ।

कृषि की इस दुर्व्यवस्था का प्रभाव अन्य जरूरी सामानी के उत्पादन पर पड़ा है एा के एवज में चारो ओर उत्पादन मे कमी है । जो मूलभूत संरचना की चीजें हैं, जीन पर पूरी अर्थव्यवस्था का ढाचा खड़ा होता है- उनकी हालत सबसे खराब है ।

बिजली को आगामी दस वर्षों मे हमे 80 हजार से 1 लाख मेगावाट अतिरिक्त बिजली की जरूरत इसकी उत्पादन विकास दर घट रही है । हमारे यहाँ के आर्थिक सर्वेक्षण बताते हे की सन 1995-96 के अंत से बिजली एव खनिज तेल के उत्पादन विकास में प्रतिशत की कमी जाहिर है बिजली की कमी का व्यापक असर है ।

इसकी आवश्यकता कृषि से लेकर तमाम क्षेत्रों, यातायात एवं दैनिक जीवन तक हर ओर है । पर्याप्त बिजली का अभाव इन सबको प्रभावित किए हुए है । यानी एक तरफ उत्पादन नहीं हो रहा तो दूसरी ओर पेट्रोलियम पदार्थो बढ रही है ।

बिजली का काम यदि पेट्रोल-डीजल से लिया जाएगा तो ऊर्जा व्यय तो और इसका कीमत पर सीधा प्रभाव पड़ेगा । यातायात व्यवस्था भी असंतोषप्रद है । हमारी रेल यातायात व्यवस्था ठीक से काम रही एव सडक यातायात भी भारी दबाव में है । रेल दुलाई की उचित व्यवस्था न होने ट्रक का व्यापक प्रयोग हो रहा है ।

पंजाब से ट्रक द्वारा जो अनाज तमिलनाडु या केरल जाएगा और कोयला यदि बिहार से ट्रक द्वारा दिल्ली-पजाब आएगा तो उसका लागत खर्च बढ़ेगा ही । फिर ट्रक के व्यापक प्रयोगों के कारण डीजल की खपत बढ रही है ।

इन सबका य पूल घाटे पर पडा है । सड़क यातायात की हालत भी कम खस्ता नहीं है । अभी हमे किलो मीटर सुपर हाइवे की आवश्यकता है । कोयले की ओर लौटे तो 31 मार्च, 1996 इंडिया लिमिटेड की हानि का ग्राफ 1647.38 करोड़ रुपए तक पहुच चुका था ।

कोयले तो यह है कि एक ओर आवश्यकतानुसार इसका उत्पादन नहीं है तो दूसरी ओर कु कारण यह अपने बजट में आवंटित राशि तक का खर्च नहीं कर पाता । सन् 1995-96 इंडिया के लिए निर्धारित बजट राशि थी, 2260 करोड़ रुपए जबकि खर्च हुआ केवत् करोड़ ।

इसी प्रकार 1994-95 की 2062.90 करोड़ की जगह मात्र 1604 करोड़ तथा 1993-94  में 1901 करोड़ की जगह मात्र 1687.92 करोड़ रुपया ही कोल इंडिया खर्च का मूलभूत ढांचे सहित तमाम क्षेत्रों में प्रगति के लिए अनुसंधान एवं विकास तथा इसको क्रियान्वित करने के लिए पर्याप्त धन चाहिए ।

हमारे यहां अनुसंधान और विकार राष्ट्रीय उत्पाद का मात्र 0.81 प्रतिशत व्यय होता है जबकि औद्योगिक देशों में इर 2 से 3 प्रतिशत है । धन की हालत यह हे कि सरकार के पास जब दैनिक खर्च त नहीं तो वह मूलभूत ढांचे में निवेश कहां से करे ।

खजाने की हालत यह है कि हमार घाटा पिछले वर्ष 64,010 करोड़ रुपये हो गया था । इस बार यद्यपि अनुमानित राज 62,266 करोड रुपये है, पर अनुमान के अनुसार स्थिति नहीं सुधरी तो यह 75 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है ।

इसी तरह राजस्व घाटा भी 31475 करोड़ की अनुमानित रासी से बढ़ने वाला है । वास्तव में कुल 1,30,345 करोड़ की अनुमानित राजस्व प्राप्तियों में से लगभग पचास प्रतिशत तो ब्याज अदायगी में ही चली जाएगी । सरकार अब अन्य कमर्शियल बैंकों की रिजर्व बैंक से उधार लेकर काम चला रही है ।

पिछले वर्ष भारतीय रिजर्व बैंक ने 25.1 प्रतिशत उधार केन्द्र सरकार को दिया, इस वर्ष यह अनुपात और बढने वाला है । जाहिर है रिजर्व बैंक को मुद्रा आपूर्ति बढाने के लिए नए नोट छापने पड़ते है जिससे नोटो की कीमत सामानो के मूल्य बढते हैं । सन् 1995-96 में मुद्रा आपूर्ति विकास दर 13 प्रतिशत थी । अभी यह 18 प्रतिशत के आसपास है ।

भारत की निरन्तर बढती हुई जनसंख्या भी महगाई का एक प्रमुख कारण में जनसंख्या वृद्धि के अनुपात की तुलना में उपलब्ध ससाधन अत्यधिक अल्प हैं । को रोकने के लिए किये गये प्रयासो के बाद भी हमारी जनसंख्या द्रुतगति से बढ़ रही है । ऐसा अनुमान है कि शताब्दी के अन्त तक हमारे देश की आबादी एक अरब तक पहुँच जाएगी ।

अत: इस आबादी के लिए समस्त सुविधाएँ जुटाना एक जटिल समस्या बन जाएगी । मुद्रस्पिगति की दर में वृद्धि भारत तक ही सीमित हो, ऐसी बात नहीं । विकासशील एवं पूंजीवादी की ओर बढ रहे अधिकांश देश इस घातक बीमारी की चपेट में आ चुके हैं ।

अन्तररष्ट्रि कोष ने 1994-95 के दौरान उपभोक्ता मूल्यों का जो आंकडा प्रकाशित किया है उसके औद्योगिक देशों में उपभोक्ता मूल्य वृद्धि 3 प्रतिशत वार्षिक से भी कम रही । इसके विपरीत की ओर बढ रहे देशो मे यह वृद्धि 100 प्रतिशत से भी ज्यादा थी । विकासशील देशों में मुर की दर कम अवश्य थी, लेकिन वहां भी यह दो अंकों में बनी रही ।

अब सवाल यह कि मुद्रास्फीति का विभिन्न देशों के मूल्य सूचकांकों पर कैसा असर हुआ । जहा तक भारत की बात है तो 1995 में थोक मूल्य सूचकांक से संबंधित मुद्रास्फीति में गिरावट अवश्य दर्ज पर उपभोक्ता मूल्य सूचकाक के साथ ऐसी गिरावट नजर नहीं आयी ।

यहां उपभोक्ता कई अन्य देशो से ज्यादा वृद्धि हुई । विभिन्न लातिन अमरीकी देशों में जहां 80 के तीन अंकों की मुद्रास्फीति एक सामान्य बात थी, वहीं विगत वर्ष यह घटकर एक अंक तर रही । उदाहरण के तौर पर अर्जेण्टीना को देखा जा सकता है ।

वहां उपभोक्ता मूल्य के संदर्भ में मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत से काफी कम थी । तेजी से विकास कर रहे दक्षिण-पूर्व देशों में भी मुद्रास्फ़ीति कम रही । लेकिन इण्डोनेशिया एवं चीन की हालत संतोषजनक भारत से ज्यादा मूल्य वृद्धि तो चीन में हुई, जिसे भविष्य की महाशक्ति माना जा रहा घाना, ईरान, नाइजीरिया जैसे देशों में तो मूल्य वृद्धि भारत से कई गुना ज्यादा थी मुद्रास्फीति एवं मूल्य के बीच अटूट रिश्ता माना जाता है ।

पर कई बार देखने में आता है कि सामानों के दाम जिस तेजी से बढे उतनी तेजी से मुद्रास्फीति नहीं बढी । मुद्रास्फीरि भी 7 प्रतिशत के नीचे ही टिकी है, पर सामानों के दाम उस स्थिति में पहुंच गये हैं जैसे दो अंकों में हो ।

यदि इसे पूरे वर्ष की मुद्रास्फीति की चाल पर नजर डालें तो इसमें चढाव दोनों दिखायी देते हैं, पर सामानों की कीमत उस हिसाब से चढती-उतरती नर्ह 1995 के अप्रैल माह से लेकर अब तक मुद्रस्फीति लगातार एक अंक तक सिमटी रही है ।

3 फरवरी, 1996 की समाप्ति वाले, सप्ताह में यह पहली बार 5 प्रतिशत की सीमा रेखा से नीचे यानि 4.71 प्रतिशत तक लुढक गयी । स्पष्ट है कि पूर्व सरकार ने चुनावों के मद्‌देनजर इसे जबरन नीचे कर रखा था । यदि पेट्रोलियम पदार्थो के प्रशासनिक मूल्यों में वृद्धि होती, तो इतनी नीचे न आ पाती और यही हुआ भी ।

2 जुलाई, 1996 को संयुक्त मोर्चा सरक पदार्थो के दामों में बढोतरी की नहीं कि मुद्रास्फीति लगभग 25 सप्ताह तक 5 प्रतिश्त लटकी रही तथा एक समय तो 25 मई, 1996 को यह 4.14 प्रतिशत तक रिकॉर्ड नीचे आ गयी गयी थी । लेकिन इसके अगले ही सप्ताह इसमें 0.18 प्रतिशत की वृद्धि की गयी ।

हालांकि तब उतार-चढाव के बावजूद 22 जून एवं 29 जून की समाप्ति वाले सप्ताह में 422 पर इसके अगले ही सप्ताह यह 4.4 प्रतिशत पर पहुंच गयी एवं तब से बढ़ती गयी । सप्ताह के अंतराल के बाद मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत की सीमा को पार कर 7 सितम्बर ओं सप्ताह में 6.02 प्रतिशत हो गयी । 14 सितम्बर की समाप्ति वाले सप्ताह में इसमें 0.23 की वृद्धि हुई और यह 6.25 प्रतिशत तक आ गयी ।

इसके अगले सप्ताह यह 6.52 प्रतिशत थी । तब से इसकी प्रवृति कभी थोडी बढने तो कभी थोडी घट जाने की बनी हुई है । जैसे 5 एवं 12 अक्टूबर, 1996, की समाप्त वाले सप्ताह में यह क्रमश: 6.45 तथा 6.65 प्रतिशत थी तो 19 अक्टूबर, 1996 के अंत वाले सप्ताह में यह 0.14 प्रतिशत कम होकर 6.51 प्रतिशत हो इसी तरह 2 नवम्बर के अंत वाले सप्ताह में मुद्रास्फीति 6.57 प्रतिशत थी ।

यदि वर्ष 1995 तुलना करें जब मुद्रास्फीति 8.84 प्रतिशत थी लेकिन आश्चर्यजनक बात यह है कि तब के दाम इतने नहीं बड़े थे, जितने आज हैं । कुल मिलाकर इस वक्त मुद्रास्फीति 7 प्रतिशत के नीचे ही है । इस हिसाब से तो दाम पिछले साल की तुलना में कम होने चाहिए थे ।

स्पष्ट है कि मुद्रास्फीति एवं मूल्यों की गणना कहीं न कहीं दोषपूर्ण है । लेकिन इसर ही कम से कम दो बातें ध्यान रखने की हैं । पहली, जो मुद्रास्फीति प्राय: दर्शायी जाती थोक मूल्य सूचकांको के संदर्भ में होती है । 1981-82 के आधार-वर्ष को 100 मानने से य 315 से 320 के बीच उछल-कूद रहा है ।

लेकिन आम आदमी का संबंध उपभोक्ता सूचत सुनिश्चित होता है, जो हमेशा थोक सूचकांक से ऊपर रहता है । उदाहरण के लिए, सितम्बर में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक अ तथा अकबर, 1996 में 346 था, जबकि अक्टूबर, 1995 यह केवल 319 था ।

इसको देखने के बाद दामो मे अंतर का यह स्फीतितिमूलक रहस्य रू तक समझ में आ जाता है । इसी तरह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के संदर्भ में मुद्रास्फीति दर अभी मापी गयी है वह 85 के आसपास है, यानी दर्शायी जा रही मुद्रास्फीति से 17 से भी ज्यादा का अतर है और यही अंतर हमारे दैनिक उपभोग की चीजो के दामों में रूप में सामने आ रहा है ।

दूसरी बात यह है कि रुपये के क्रय मूल्य मे गिरावट आयी है । औद्द्योगिक श्रमिकों के लिए बनाये गये सूचकांक के अनुसार 1981-82 के आधार-वर्ष की तुलना में गर अकबर माह में एक रुपये का औसत मूल्य मात्र 28.90 पैसे रह गया था, जबकि वर्ष 1995 में इसी समय यह 31.35 पैसे था ।

कहने की आवश्यकता नहीं कि जब रुपये की क्रर घटेगी, तो कम सामान के लिए ज्यादा रुपये देने ही होंगे । यह कहना गलत न होगा कि कुव्यवस्था इस स्थिति को और अत्यधिक गम्भीर बनाऐगी । सन 1981 में उपभोक्ता साम। मूल्य काफी तेजी से बढने लगे थे, तब एक आ।र्छक समन्वय विभाग गठित किया गया विभाग सीधे प्रधानमन्त्री के अधीन कार्य करता था जिसके अन्तर्गत सर्वप्रथम प्रत्येक चीज की मॉनिटरिंग शुरु की गई कि महंगाई क्यों बढ़ रही है, मूल्य सूचकांक की क्या दशा है, की गति कैसी है आदि ।

सभी बातों की जाँच-परख कर मूल्य को जबरन कम करने र्क वृद्धि की जड में निहित कारणों को दूर करने की कोशिशें की गई । जैसे सरकारी खर्चो की गई, विद्युत उत्पादन में वृद्धि हुई, रैल यातायात में व्यापक सुधार हुए, कोयला ए के उत्पादन एवं उसके आवागमन को सुव्यवस्थित किया गया, कृषि में उर्वरकों का आ उसके उचित वितरण की हर संभव व्यवस्था की गयी ।

इन सबका मिलाजुला परिणाम कि दामों में अपने आप गिरावट आयी । यदि इन मूल चीजों को जारी रखा जाता तै इतनी बदतर नहीं होती । वास्तव में महंगाई की समस्या को केवल तात्कालिक और उसमें भी सही तरीके से करना उचित नहीं होगा । जिस तेजी से आबादी बढ़ रही है इसके अनुपात में उत्पादन व्यवस्था नहीं की गयी है ।

प्रतिवर्ष एककरोड अस्सी लाख आबादी बढ रही है, जबकि कृषि पैदावर लाख टन के आसपास ही रुकी है । कम से कम 50 से 100 लाख टन की न वर्ष होनी चाहिए । लेकिन इसके लिए सिंचाई की और अधिक व समुन्नत व्यवस्था करनी होगी ।

अच्छे बीज तथा उर्वरकों की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करनी होगी । दुर्भाग्यवश इन क्षेत्रों में पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है । जाहिर है जब मांग के एवज में उपलब्धता कम हागा ता में वृद्धि होगी ही । फिर इसके प्रभाव अन्य क्षेत्रों में भी पड़े हैं ।

औद्योगिक उत्पादन घट रहा गन्ना उत्पादन कम है, तिलहनों की कमी है, विभिन्न औद्योगिक कच्चे मालों की भारी कमी इससे आगे विद्युत उत्पादन की हालत और भी खराब है । बिजली की कमी के कारण पेट्रोलि पदार्थो की खपत हर दिन बढ रही है, यातायात व्यवस्था भी रोगग्रस्त है, मालवाहक रेलों हालत ठीक नहीं, तो सामानों की दुलाई के लिए ट्रकों का अधिकाधिक उपयोग हो रहा है ।

इर असर तो दामों पर पड़ेगा ही । यदि ऊर्जा व्यय दर ज्यादा है तो दाम भी ज्यादा होंगे । रेल सुचारू ढंग से काम करती तो न डीजल-पेट्रोल की खपत ज्यादा बढ़ती, न माल भाड़ा बढ़ता । स्वाभाविक ही तब मूल्य वृद्धि नहीं होती । लेकिन स्थिति ऐसी है नहीं ।

ऐसा नहीं है कि पिछली या वर्तमान सरकार ने इन मूलभूत संरचनाओं के विकास पर नहीं दिया है, पर इसके लिए जितना कुछ किया जाना चाहिए था, नहीं किया गया है । इसका मुख्य कारण तो पूजी का अभाव ही है । सरकार ने मूलभूत संरचना के क्षेत्र में देशी एवं निजी पूंजी निवेश की नीति घोषित की, किन्तु इसका समय पर ठीक प्रकार से क्रियान्वयन हुआ ।

एनरॉन इसका एक उदाहरण है । फिर भ्रष्टाचार की हालत यह है कि कोई प्रोजेक्ट फा हुआ नहीं कि भ्रष्ट तरीके अपनाने के आरोप लगने शुरू हो गये । जरूरत निवेश बढ़ाने जोकि बढ नहीं रहा और यदि निवेश कम होगा तो उत्पादन भी पर्याप्त नहीं हो सकता । अभी इसी खतरनाक स्थिति से गुजर रहा है ।

यहां यह भी कहना शायद गलत नहीं हीगा यदि अस्थिर सरकार केन्द्र में नहीं होती तो स्थिति इतनी भयावह अवस्था में नहीं पहुंच सरकार को आर्थिक विकास के लिए कठोर निर्णय करने होंगे, जो इसके बूते की बात सभी खर्चो में कटौती चाहते हैं, क्योंकि बगैर कटौती के विकास के लिए संसाधन उपलब्ध हो सकता ।

कह सकते हैं कि कई मायनों में मूल्य वृद्धि अचानक सामने आयी है । इसका भी सरकार की कुव्यवस्था ही है । खर्च में कटौती करै नहीं सकते और राशि इतनी भी कि प्रतिदिन के खर्चो को पूरा किया जाये । परिणामत: रास्ते दो ही हैं-कर्ज लो एवं नये नोट छापो ।

राजस्व घाटा 75 हजार करोड़ रुपये को पार करने वाला है । इसकी भरपाई यी कर्ज लेकर या नये नोट छापकर करेंगे तो मूल्य वृद्धि क्यों नहीं होगी । आवश्यकता से सच्चा में नोट छापनें में उसका मूल्य गिरता है जिसका असर दामो पर पड़ता है ।

यह कहना कि मूल्य वृद्धि प्रकारांतर से आर्थिक सुधारों की परिणाग्स है, उचित नहीं वास्तव मे आर्थिक सुधार जितना कागजों में है उसका शतांश भी धरातल पर नहीं है । सुधार का अर्थ क्या था क्या निश्चित क्षेत्रों को राज्य के एकाधिकार से मुक्त कर नि के लिए खोलना तथा कोटा-परमिट राज्य को समाप्त करना था ।

ऐसा तो हुआ नहीं । उद है कहा ? केवल नीति में । अत: इसे दोष देने का कोई मतलब नहीं है । मूल कारण राज प्रशासनिक एव वित्तीय कुव्यवस्था है । सरकार को हर चीज के लिए सभी गुटो त्ही सहमति होती है, जोकि असभव है । कई मन्त्री इकॉनोमिक ड्राईव की बात करते है, जबकि उनके सहयोगी दल केवल अपने सकुचित राजनीतिक स्वार्थ पर अडे रहते हैं ।

सभी दिखावे के लिए कर रहे है । इससे सस्ती लोकप्रियता भले कुछ समय के लिए मिल जाये समस्या औरे उलझेगी ही समस्या और गभीर होने वाली है । महगाई का जो सकट अभी है, वह और गहरा होगा मूल चीजो को रास्ते पर लाने का मुद्‌दा अब सरकारो में है ही नहीं ।

बेशक, टिकाऊ उपभोक्ता सामग्रियों के दामों में उन्नति वृद्धि नहीं हुई है जितनी रोज़मर्रा के इस्तेमाल में आने वाली चीजों में हुई है । सच कहें तो खाद्य सामाग्रया क दाम हा बढे हैं । दरअसल, टिकाऊ सामानों से मुख्यत: केवल मध्यम वर्ग का ही वास्ता है, उपभोग की चीजें सभी के लिए जरूरी हैं ।

फिर टिकाऊ सामानों के उत्पादन या ज्यादा कम्पनियां शामिल है कि उनके बीच भारी प्रतिस्पर्धा है । सामानों की किर्ल्लत मूल्य वृद्धि नहीं हुई । दैनिक उपयोग की चीजों के साथ ठीक इसके उलट स्थिति जो हो रहा है वह अर्थशास्त्र के सामान्य नियमों के अनुसार ही है ।

मान लीजिए, तुलना में आपूर्ति की कमी कृत्रिम है, जमाखोरी के कारण स्थिति बिगड़ी है, या फिर मांग में ही उतार-चढाव जैसी स्थिति बनी हुई है तो यह कालाबाजारी की बात नहीं हुई । अगर जमाखोरी की स्थिति है तो उसका कारण सामानों की अपर्याप्त उपलब्धता ही मानी जाएगी । जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकती ।

सवाल उठ सकता है कि स्थिति को काबू में कैसे लाया जाये ? इसके लिए दूरगामी दोनों प्रकार के कदम उठाने होंगे । निकटवर्ती कदमों में सरकार अपने छ करे तथा दिखावे के लिए जो अनावश्यक व्यय है उसे पूरी तरह समाप्त कर दे मशीनरी को चुस्त किया जाये तथा भ्रष्टाचार नियत्रण के तात्कालिक उपाय किये कदमों में मूलभूत संरचनाओं का तीव्र विकास अनिवार्य है ।

केवल कर बढाना कोई समाधान है ही नहीं । करों की चोरी एवं भ्रष्टाचार पर रोक लगाना कहीं कम लागत में अधिकतम और बेहतर उत्पादन कैसे संभव हो, इसकी व्यवस्था जनसंख्या वृद्धि पर नियन्त्रण करना होगा । मगर ऐसा होना संभव नहीं दिखता ।

विद्यामान सरकार ठोस निर्णय ले ही नहीं सकती और आगे भी संभावना डांवाडोल सरकार की ही है । मूलभूत संरचना का विकास एक लबी प्रकिया है, जिसकी पूर्ति राजनैतिक अनिश्चितता के भवर में नहीं कर सकती ।

कुल मिलाकर महगाई एक बहुआयामी समस्या है एवं इसका समाधान भी संभव है । पच्चर डालकर हम केवल तात्कालिक उबाल को ही शांत कर सकते हैं । की बात है कि समस्या को समग्रता में देखने का प्रयास कहीं से नहीं हो रहा है ।

इस दिशा में गंभीर है और न ही विपक्ष । वैसे भी कठोर निर्णय लेना इस भानुमति सरकार के वश की बात नहीं । फिर तो एक ही रास्ता बचा है कि हम महंगाई में जिने का अभ्यास करें ।

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